Sunday, 30 August 2015

पुस्तक चर्चाः


मैं जहाँ हूँ साहित्य जगत के लिए एक उपहार से कम नहीं है
     
छोटी बहर के बड़े मशहूर ग़ज़लकार विज्ञान व्रत को पढ़ना याने एक पल में दुनिया देखने जैसा है । हाल ही में आया उनका ग़ज़ल संग्रह मैं जहाँ हूँ प्रकाशित हुआ । ये मेरे प्रति उनका अनुराग है कि जिस दिन दिल्ली में इस संग्रह का लोकार्पण हुआ उसी दिन इस संग्रह की प्रति डाक से मुझे मिली । विज्ञान जी की ग़ज़ले सरल और सहज भाषा लिए होती है यह निर्विवादित सत्य है । हिंदी में ग़ज़लकारों की भीड़ में उनका अपना स्थान है उनके अपने मुहावरे है, अपनी भाषा है और साथ में होती है व्यंजना, जो ग़ज़ल को गहराई देती है । यहीं कारण होता है कि उनकी ग़ज़लें हमसे सीधे संवाद करती नज़र आती है । वे कहते है-
जिन का तू दीवाना हो ।
ऐसे कुछ दीवाने रख ।।

मुझ से मिलने-जुलने के ।
अपने पास बहाने रख ।।

एक पीड़ा जिसका अनुभव गॉव से शहर आया हर कोई व्यक्ति करता है उस पर वे कहते है-

                               गाँवों में जो घर होता है ।
                               शहरों में नम्बर होता है ।।

फ़कीराना अंदाज में उनके शेर कुछ इस तरह से अन्तर्दृष्टि लिए है कि उनके मायने हर बार अलग नज़र आते है-
जब तक उनके पास रहा ।
मैं हूँ ये अहसास रहा ।।

दुनियादारी जी कर भी ।
मुझमें इक संन्यास रहा ।।

वर्तनान राजनैतिक परिदृष्य और संवेदना की कसौटी पर उनकी ग़ज़लें दर्द को लफ्ज़ देती है-

रोज़ नयी इक चाल सियासी ।
प्रश्न हुआ रोटी का बासी ।।

बस्ती-बस्ती भीड़ बढ़ी ।
लेकिन तनहा शहर हुआ है ।।

विज्ञान जी को पढ़ना याने अपने दिल की बात उनकी गज़लों में आ जाने जैसा है, वे कहते है-

औरों से क्यूँ कहलाते हो ।
खुद ही अपनी बात कहो ना ।।

क्या सब कुछ हम ही बतलाएँ ।
तुम भी तो कुछ याद करों ।।

सरल शब्द और गहन अर्थों से भरी ,छोटी लेकिन वजनदार गज़ल़ कहने वालों के बिच उस्ताद का दर्ज को प्राप्त विज्ञान व्रत जी का यह संग्रह मैं जहाँ हूँ साहित्य जगत के लिए एक उपहार से कम नहीं है । हालाकि मैं उनकी ग़ज़लों का तब से पाठक और प्रशंसक रहा हूँ, जब साहित्य के मेरा कोई वास्ता नहीं था । मैं ईश्वर से यहीं कामना करता हूँ कि विज्ञान जी की क़लम में शब्दों का प्रवाह बना रहे और हम जैसे उस प्रवाह में सतत गोते लगाते रहे...।
कृति-
मैं जहाँ हूँ
ग़ज़लकार –
विज्ञान व्रत, एन-138, सेक्टर-25, नोएडा 201301
प्रकाशक -अयन प्रकाशन ,नई दिल्ली
पृष्ठ –104
मूल्य –200/- रुपये
समीक्षक-
संदीप सृजन
संपादक – शब्द प्रवाह
प्रबंध संपादक- शाश्वत सृजन
ए-99 वी. डी. मार्केट, उज्जैन 456006
मोबाइल -09926061800

Friday, 14 August 2015

स्वतंत्रता दिवस नहीं........... स्वाभिमान दिवस मनाएँ

स्वतंत्रता दिवस नहीं........... स्वाभिमान दिवस मनाएँ
                                                        -संदीप सृजन

हर साल 15 अगस्त आता है.... हर साल हमें यह याद दिलाया जाता है कि हम अंग्रेजों के गुलाम थे । आखिर बार-बार क्यों और कब तक हम याद करे की हमारे पूर्वज गुलाम थे । माना कि हमारे देश के कुछ स्वार्थी राजाओं, नवाबों की सामर्थता कमजोर थी, सत्ता में बने रहने के लिए उन्होने अंग्रेजों से संधि की, स्वयं उनके गुलाम बन गये और पुरे देश को धीरे-धीरे गुलाम बना डाला । जनता मजबूर थी, उनके राजा ने खुद गुलाम होना स्वीकार कर लिया तो उन्हें तो स्वाभाविक रूप से राज आदेश का पालन करना ही था ।
गुलामी के बंधन में बंधे कई लोग ऐसे थे जो बंधन तोड़ कर स्वाभिमान से जीना चाहते थे । उन्होने अपने सामर्थ अनुसार अपने राजा और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोंलन करे, बगावत की और लोगो को जगाया, कई वीरों अपने प्राणों की आहूति दी तब जाकर लम्बे समय के विद्रौह का परिणाम यह निकला की अंग्रेजों ने भारत की जनता को अपने चंगुल से मुक्त किया। लेकिन जिन हाथों में भारत सौंपी वे हाथ पूरी तरह से अंग्रेज मानसिकता वाले थे । यही वजह रही भारत की जनता को अंग्रेजों ने मुक्त किया, भारत को नहीं ।
सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अंग्रेजों के कानून, अंग्रेजों के नीति नियम और यहॉ तक की अंग्रेजों के प्रतिनिधी वायसराय के मार्गदर्शन में देश चला रहे थे। 15 अगस्त 1947 को देश की जनता को आजाद करने और बाद में उसे अपने तरीके से चलाने की पूरी रणनीति लगभग 2-3 साल पहले ही तैयार की जा चुकी थी । सब कुछ अंग्रेजों की मर्जी अनुसार हुआ, भारत में प्रजातंत्र की स्थापना की गई और बागडोर गुलाम मानसिकता वालों को सुपुर्द की गई । सामने देसी अंग्रेज थे पीछे विदेशी । बस पीछे वालों के आदेशानुसार 1948 से 15 अगस्त को आजादी की वर्षगांठ के रूप में मनाना प्रारम्भ कर दिया गया । याने कि मुर्खता पूर्वक उत्सव मनाना शुरू हो गया । माना की 15 अगस्त 1947 को उत्सव मनाना सही था , लेकिन अपनी गुलामी से मुक्ति के दिन को सालाना उत्सव का रूप देना कहा की अक्लमंदी है ।
यदी इस दिन को यादगार बनाना ही था तो इसे स्वतंत्रता दिवस के बजाए स्वाभिमान दिवस या आत्मसम्मान दिवस नाम देना था। जिससे कम से कम यह तो नही कहना और सुनना पड़ता की हम गुलामी से मुक्ति का उत्सव मना रहे है । हम शान से कह सकते कि हम अपने आत्मसम्मान का दिन मना रहे है । हम उन तमाम वीरों को याद करे, उनकी शहादत को नमन करे जिनकी वजह से हम अपना स्वाभिमान पुनः प्राप्त कर पाए । आईए .....इस दिन को हम भारत स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाए.... और सब को बधाई दे ......स्वाभिमान से जीवन की मंगलकामनाएँ दे ।
जय हिन्द। जय भारत ।।

संदीप सृजन

sandipsrijan999@gmail.com