Thursday, 12 June 2014

कबीर जयंती पर विशेष

कबीर जयंती विशेष -

सामाजिक क्रांति के अग्रदूत संत कबीरदासजी
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इस धरती को संस्कृत में "बहुरत्ना वसुंधरा " कहा गया है ।कई रत्न को यह धरती धारण किये हुए है, कई महापुरुषो की कर्म स्थली बनी है यह धरती ।कई सौ सालों में कोई एक महापुरुष ही धरती पर जन्म लेता है जो समाज में अलग राह बनाकर सर्वोपरि स्थान हासिल करता है। समाज में अपने हित को अलग रखकर समाज के लिए काम करने वाले विरले ही होते हैं । हमारे देश में ऐसे कई कवि, ऋषि, मुनि, महापुरुष आदि हुए हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन समाज कल्याण के लिए अर्पित कर दिया. ऐसे ही एक महापुरुष हुए हैं संत कबीरदास जी जिन्हे सामाजिक क्रांति का अग्रदूत कहा जाना चाहिए ।

संत कबीरदास जी  भक्ति आन्दोलन के एक उच्च कोटि के कवि, समाज सुधारक एवं भक्त माने जाते हैं ।समाज के कल्याण के लिए कबीर ने अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया संत रामानंद के बारह शिष्यों में कबीर बिरले थे जिन्होंने गुरु से दीक्षा लेकर अपना मार्ग अलग ही बनाया और संतों में वे शिरोमणि हो गये ।

जेष्ट शुक्ल पूर्णिमा संवत् 1455 (1398ईसवी) को जन्मे एक ही ईश्वर में विश्वास रखने वाले कबीर के बारे में कई धारणाएं हैं ।उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक मतभेद ही मतभेद हैं । जिस समय कबीर का जन्म हुआ था उस समय देश की स्थिति बेहद गंभीर थी। जहां एक तरफ मुसलमान शासक अपनी मर्जी के काम करते थे वहीं हिंदुओं को धार्मिक कर्म-काण्डों से ही फुरसत नहीं थी।जनता में भक्ति-भावनाओं का सर्वथा अभाव था।  पंडितों के पाखंडपूर्ण वचन समाज में फैले थे।ऐसे समय मे संत कबीर ने समाज के कल्याण के लिए अपनी वाणी का प्रयोग किया । कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था ।कबीर ने शास्त्रीय भाषा का अध्ययन नहीं किया था,  फिर भी उनकी भाषा में परम्परा से चली आई विशेषताएं विध्यमान थी । संत कबीरदास ने अपने दोहों के माध्यम से जनता में अपनी आवाज पहुंचाने के बेहतरीन कोशिश की ।उनके दोहे लोकभाषा में होते थे और इन्हें समझना बेहद आसान होता था। कबीर के दोहे में जो मर्म वह किसी की भी जिंदगी पल में बदल सकते है ।

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग ।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग ।।

साधुओं के साथ नियमित संगत करने और रात दिन भगवान का नाम जाप करते हुए भी उसका रंग इसलिये नहीं चढ़ता क्योंकि आदमी अपने अंदर के विकारों से मुक्त नहीं हो पाता।

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि।
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाही ।।

कबीरदास जीं कहते हैं कि संतजन तो भाव के भूखे होते हैं, और धन का लोभ उनको नहीं होता । जो धन का भूखा बनकर घूमता है वह तो साधू हो ही नहीं सकता ।

जैसा भोजन खाइये , तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।

कबीरदास जी के कई दोहे ऐसे है जो वर्तमान में लोकोक्ति या कहावत बन चुके है और जन जन की जुबान पर चढे हुए है जिनका विश्लेषण स्वतः ही हो जाता है।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। 
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥ 

माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर । 
कर का मन का डा‍रि दे, मन का मनका फेर॥ 

तिनका कबहुं ना निंदए, जो पांव तले होय।
कबहुं उड़ अंखियन पड़े, पीर घनेरी होय।।

गुरु गोविंद दोऊं खड़े, काके लागूं पांय। 
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय॥ 

साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। 
मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय॥ 

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। 
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥ 

कबीरा ते नर अंध है, गुरु को कहते और। 
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥ 

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। 
आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर॥ 

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय। 
हीरा जनम अमोल है, कोड़ी बदली जाय॥ 

दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे होय॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥

उठा बगुला प्रेम का, तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला ,तिन का तिन के पास॥

सात समंदर की मसि करौं ,लेखनि सब बनाई।
धरती सब कागद करौं ,हरि गुण लिखा न जाई॥

हिन्दी साहित्य के हज़ारों  वर्षों के इतिहास में कबीरदास जी जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ।महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वन्द्वी जानता है, तुलसीदासजी परन्तु तुलसी और कबीर के व्यक्तित्व में बड़ा अन्तर था. यद्यपि दोनों ही भक्त थे, परन्तु दोनों स्वभाव, संस्कार और दृष्टिकोण में एकदम भिन्न थे. मस्ती, फ़क्कड़ाना स्वभाव और सबकुछ को झाड़–फटकार कर चल देने वाले तेज़ ने कबीर को हिन्दी–साहित्य का अद्वितीय व्यक्ति बना दिया है।कबीरदासजी  एक जबरदस्त क्रान्तिकारी पुरुष थे.

जन्म के बाद कबीरदास जी  की मृत्यु पर भी काफी मतभेद हैं।अगहन शुक्ल 11संवत् 1557  को कबीरदास जी  ने मगहर में देह त्याग किया था और उनकी मृत्यु के बाद हिंदुओं और मुस्लिमों में उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था।  हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से हो।इसी विवाद के दौरान जब शव से चादर हटाई गई तो वहां शव की जगह फूल मिले जिसे हिंदुओं और मुस्लिमों ने आपस में बांटकर उन फूलों का अपने अपने धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार किया।

आज हमारे बीच कबीरदासजी नहीं हैं लेकिन उनकी रचनाओं ने हमें जीने का नया नजरिया दिया है।ऐसी मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति कबीर के दोहे के अनुसार अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाता है तो निश्चय ही वह एक सफल पुरुष बन सकता है ।

@ संदीप सृजन
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संदीप सृजन
ए-99 वी.  डी.  मार्केट,  उज्जैन
मो.  09926061800

Friday, 6 June 2014

हिंदी के अच्छे दिनों की शुरूआत

हिंदी के अच्छे दिनों की शुरूआत
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आजाद भारत में 67 सालों में जितने भी प्रधानमंत्री हुए उनमें से अधिकांश ने  अंग्रेजी मे अपना काम करना और अंग्रेजी में बात करना ही अपनी शान समझा, हिंदी को केवल 15 अगस्त पर लाल किले पर संबोधन के लिए उपयोग किया , अधिकारी और उच्चसेवा में कार्यरत कर्मचारियों ने आम आदमी पर धाक जमाने के लिए अपने कामकाज और व्यवहार की भाषा के रूप में अंग्रेजी को अपनाया और हिंदी को निम्न स्तर की भाषा सिद्ध किया और हिंदी को हाशिये पर ला कर खड़ा करने को पुरजोर प्रयास किया । हिंदी की जितनी दुर्दशा ये लोग कर सकते थे इन्होने की ।यही वजह रही है हर कोई अपने बच्चे को और कुछ सीखा पाए  , पढ़ा पाए या नही पर कांवेंट स्कूल में भेजने और बच्चे को अंग्रेजी पढ़ाकर अपना सुखद भविष्य देखने लगा है ।

हिंदी के ऐसे दुखद समय में नई सरकार  और नये प्रधानमंत्री के आते ही हिंदी की दशा सुधरने के आसार नजर आने लगे है । नई सरकार के गठन के दौरान सर्वाधिक मंत्रियों ने हिंदी में शपथ ग्रहण की, कबिना मंत्रियों की बैठक में हिंदी में चर्चा हुई, विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों की बैठक में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदी में बातें करी और हिंदी में ही अधिकारियों ने जवाब दिए । और सुखद तब हुआ जब सार्क देश के सभी प्रमुखों से हिंदी में चर्चा की गई। हाल ही अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अमेरिका आमंत्रित किया है, इस दौरान भी भारत के प्रधानमंत्री सिर्फ हिंदी में ही बात करेंगे भाषाई समस्या के लिए दुभाषिये की मदद ली जाएगी । प्रधानमंत्री का हिंदी प्रति यह सम्मान गौरव की बात है आजादी के 67 साल बाद हिंदी को अपने घर में ही नही बाहर भी सम्मानित किया जा रहा है,  राष्ट्रभाषा  संघर्ष समिति, राजभाषा संघर्ष समिति और भी कई ऐसी नागरिक समितिया जिनके प्रयासो का अब पूरे होने के दिन आ गये है ।सच में हिंदी के लिए तो अच्छे दिन आने वाले है ऐसा लगने लगा है ।

चाणक्य ने कहा भी है "यथा राजा तथा प्रजा "भारत के प्रधानमंत्री हर जगह हिंदी का प्रयोग करेंगे को उनके मातहत भी अपना काम हिंदी में करेंगे , उसी का अनुसरण देशवासी भी करेंगे ।उम्मीद की जा सकती है कि ऊपर  से शुरूआत हुई है तो निचे तक जल्दी सुधार  होगा । बैंक, कोर्ट कचहरी,शिक्षा , चिकित्सा के क्षेत्र में में क्षेत्रीय भाषा और हिंदी को बढावा मिलने के आसार अब स्पस्ट नजर आने लगे है जो सुखद है ।हिंदी के लिए सभी मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समितियां बनी हुई है जो 67 सालों से सिर्फ कागजी लिपा पोती कर रही थी अब अपने वास्तविक रूप में खुलकर काम कर सकेगी ।
और हिंदी के लिए अच्छे दिन आएँगे ।हिंदी अपना खोया हुआ सम्मान पुनः प्राप्त करेगी ऐसा विश्वास है ।

@संदीप सृजन
संपादक -शब्द प्रवाह
sandipsrijan999@gmail.com

Tuesday, 3 June 2014

एक सार्थक प्रयास - शब्दो के पुल (समीक्षा)


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@कृति- शब्दो के पुल
@कवयित्री - डॉ सारिका मुकेश(वेल्लौर) @प्रकाशन - जाहृवी प्रकाशन दिल्ली
@मूल्य -₹ 200/-

हिंदी कविता जगत सदा से उदार रहा है,  यही कारण है की उर्दू ,फारसी की गजल, अंग्रेजी की अतुकांत कविता, और जापानी कविता का छंद हाइकु अपनी अहम् जगह बना पाये है । बाहरी शिल्प को अपनी भाषा और भाव में बांधना मुश्किल काम है, पर कई कलमकार इसे अपना रहे और अपनी कलम का अपने चिंतन का लोहा मनवा रहे है ।

मेरे सामने रखी डॉ सारिका मुकेश की कृति "शब्दो के पुल " सच में एक बङा पुल बनकर प्रकाशित हुई है जापानी छंद और हिंदी कथ्य के बीच में , छंद का विधान 5-7-5   वर्ण  का है और मात्र 17 अक्षरों मे अपनी बात पूरी करना इसकी सबसे पहली शर्त है जिसे डॉ सारिका मुकेश ने बड़ी सहजता से पूरा किया है । 308 हाइकु इस कृति में लिए गये है,  सबसे अच्छी बात यह की हरेक हाइकु के साथ उसकी जन्मतिथि और स्थान का भी उल्लेख किया है जो रचनाकार का रचनाकर्म के प्रति गंभीरता को दर्शाता  है ।

इस कृति के हाइकु पर चर्चा करे तो "वंदे चरण " से "कर दो क्षमा " तक 83 विषय पर हइकु इस कृति में है । विनम्र भाव को अभिव्यक्त करता पहला हाइकु -

वंदे चरण
तुझको समर्पण
श्रद्धा सुमन

सबेरे के दृष्य पर मानवीय स्थिती का वर्णन बहुत अच्छे तरीके से किया है -

मन में नेह
अलसाई सी देह
हुई सुबह

अक्सर कहा जाता है "उम्मीद पर दुनिया टिकी है" यह बात सारिका जी बड़े सलीके से कहती है -

कैसी निराशा
जीवन का अर्थ है
आशा - प्रत्याशा

मन के भावों पर कहती है -

सोचता मन
हो सब कुछ यहॉ
सिर्फ अपना

वर्तमान समय पर वे कहती है -

कैसा विकास
आदमी को आदमी
काटता आज

हो चला अंत
संवेदनाएं शून्य
इच्छा अनंत

फाईल में ही
सिमटी जीवन की
ये रामायण

एक जगह प्रश्न वाचक हाइकु का प्रयोग कुछ नया पन लिए पढ़ने में आया -

बताना कृष्ण
कौन है तुम्हे प्रिय
राधा या मीरा?

विषय की विविधता के बीच पौराणिक पात्रों पर पर केन्द्रित हाइकु भी अपना प्रभाव जमाते नजर आते है -

दुधो नहायी
अपने पिता घर
भटके सीता

सत्य के लिए
दिया राम का साथ
विभीषण ने

वाह रे कृष्ण
खूब रोका तुमने
चीर हरण

आज साहित्य में व्यंग्य हर विधा पर भारी है ऐसे में कोई भी रचनाधर्मी व्यंग्य के बगैर अपनी बात पूरी नही कर पाता है सारिका जी भी राजनीतिक संदर्भ पर कहती है -

यूँ चाल चली
जिसको मिला मौका
कुर्सी खींच ली

संसद मौन
गरीब की व्यथा को
समझे कौन

दर्शन, अध्यात्म, इतिहास  ,भावना, वेदना, संवेदना ,आशा, निराशा, व्यवहार आदी कई मानवीय जीवन और जिज्ञासा के विषयों पर  डॉ सारिका मुकेश ने अपनी कलम चलाई और एक सार्थक प्रयास के रूप में शब्दो के पुल समाज को दिया है जो विचारों के प्रवाह का सुंदर संग्रह है, इस संग्रह के लिए वे बधाई की पात्र है ।
भविष्य के लिए मंगलकामनाओं सहित ...

@समीक्षक
-संदीप सृजन
संपादक - शब्द प्रवाह
उज्जैन (म.प्र.)